Narendra Modi Completes 20 Years In Energy As Cm And Pm Know About The Plans Incomplete Regardless of Highly effective Majority – मोदी के सत्ता में 20 साल: जमीन अधिग्रहण से लेकर कृषि कानून तक, वे योजनाएं जिन्हें लागू नहीं करा पाई सरकार

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सार

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मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी के सत्ता में 20 साल कल पूरे हो जाएंगे। हम आपको बता रहे हैं कि मोदी सरकार की वो कौन सी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, जिन्हें लागू कराने के लिए सरकार ने संसद में कानून तक पारित करवा दिए, लेकिन फिर पीछे हटने की नौबत आ गई। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाएं, जिन्हें बैकसीट में छोड़ा गया।
– फोटो : Amar Ujala

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23 मई 2019। ये वो तारीख थी, जब आम चुनाव में जीत हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनना तय हो गया। भारतीय जनता पार्टी को 2019 के आम चुनाव में 37 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और पार्टी ने 303 सीटों पर बड़ी जीत हासिल की। लोकसभा में भाजपा का कब्जा करीब 55 फीसदी सीटों पर हो गया। माना जा रहा था कि देश की जनता ने 2014 से 2019 के कार्यकाल के दौरान अधूरे रह गए वादों को पूरा करने के लिए ही मोदी सरकार को दूसरा मौका दिया था। हालांकि, इस साल जुलाई में जब पीएम मोदी ने खुद मंत्रालयों की समीक्षा के बाद कैबिनेट में फेरबदल को मंजूरी दी, तो यह तय हो गया कि पीएम की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं अभी अधूरी हैं, जिन्हें सरकार अगले तीन साल में पूरा करने के लिए जोर-शोर से तैयारी कर रही है। 
मोदी के सत्ता में 20 साल 7 अक्तूबर को पूरे होने जा रहे हैं। इस मौके पर हम आपको बता रहे हैं कि मोदी सरकार की वे कौन सी महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, जिन्हें मजबूत जनादेश होने के बावजूद अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। इनमें से कई योजनाओं को लागू कराने के लिए सरकार ने संसद में कानून तक पारित करवा दिए, लेकिन ऐन मौके पर विरोध प्रदर्शन या एक धड़े की सहमति न होने के चलते योजनाओं पर ब्रेक लगाने और पीछे हटने तक की नौबत तक आ गई। 
दूसरी बार सत्ता में आने के महज दो महीने बाद अगस्त में भाजपा सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा रद्द करवाने के लिए विधेयक पेश किया। सरकार ने जम्मू-कश्मीर को सफलतापूर्वक केंद्र शासित प्रदेश में भी बांटने का कानून बनवा लिया। इसके चार महीने बाद मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद में मंजूरी दिलाकर कानून में तब्दील करवा लिया। सीएए के तहत पहली बार अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता साफ किया गया। 
इससे पहले भाजपा अध्यक्ष रहते हुए अमित शाह ने सीएए को नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) लाने के प्रस्ताव से भी जोड़ा था, जिसे लेकर काफी हंगामा हो चुका था। यानी एनआरसी भी मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक रहा है। असम में बांग्लादेश से आए हिंदुओं और मुस्लिमों की पहचान के लिए एनआरसी बनाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी भाजपा ने समर्थन किया था और कई नेताओं ने इसे आगे लागू कराने की बात भी कही।  
नागरिकता संशोधन विधेयक को कानून बनवाने के बाद मोदी सरकार ने 2020 में कृषि क्षेत्र में बड़े बदलावों के मकसद से तीन कृषि विधेयक संसद में पेश किए और विरोध के बावजूद इन्हें पारित करवा के कानून बनवाया। सरकार इसके जरिए कृषि क्षेत्र में खुले बाजार लाने के समर्थन में रही। 
उधर पहले कार्यकाल (2014-19) में मोदी सरकार ने संख्याबल की बदौलत जमीन अधिग्रहण अध्यादेश जारी किया था। इसके तहत यूपीए ने 2013 में जो जमीन अधिग्रहण पर कानून बनाया था, उसके नियमों में बदलाव किए जाने थे। इसके तहत सरकार को पांच तरह के प्रोजेक्ट्स- राष्ट्रीय सुरक्षा, ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर, घर बनाने की योजना, औद्योगिक कॉरिडोर और सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन हासिल करने पर अतिरिक्त अधिकार मिल रहे थे। 
मोदी सरकार की यह चारों ही योजनाएं काफी अहम रहीं। हालांकि, एक के बाद एक इन सभी योजनाओं पर जिस तरह के विरोध दर्ज कराए गए, उससे इनके लागू होने की राह कठिन हो गई। इसका सबसे पहला उदाहरण है सीएए कानून…
भाजपा के 2014 के घोषणापत्र में यह वादा किया गया था कि उनकी सरकार देश में घुसपैठ रोकने और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक स्पष्ट नीति बनाएगी और इसका हल निकालेगी। 2019 के घोषणापत्र में भी इसी वादे को दोहराते हुए भाजपा ने कहा कि वह नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) को भी जोर-शोर से पूरा कराएगी। लेकिन 11 दिसंबर 2019 को संसद में विधेयक पारित कराने के बाद इस कानून का सड़कों पर विरोध शुरू हो गया। कई मुस्लिम संगठनों ने दिल्ली से लेकर लखनऊ और अहमदाबाद से लेकर कोलकाता तक इस कानून के विरोध में प्रदर्शन किए। 
इन प्रदर्शनों के चलते ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि पर काफी नकारात्मक असर पड़ा। 2020 में यूएन मानवाधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ याचिका भी दायर कर दी। अमेरिका के थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने इन प्रदर्शनों के बीच ही भारत के लोकतंत्र को स्वतंत्र से आंशिक स्वतंत्र के दर्जे पर पहुंचा दिया था। इसका असर यह हुआ कि भारत सरकार ने जोर-शोर से पारित करवाए गए सीएए को लागू करने की योजना को पीछे कर दिया और इसके नियमों को अब तक फाइनल नहीं किया है। गृह मंत्रालय ने जुलाई में संसद को बताया था कि वह अभी सीएए के नियमों को तय करने के लिए छह महीने और लेगा। 
मोदी सरकार का तीन कृषि विधेयकों को पारित कराए जाने का कदम देश के कृषि क्षेत्र के लिए बड़े बदलावों की नींव माना जा रहा था। हालांकि, इन्हें लेकर पंजाब, हरियाणा और फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन शुरू हुए, उनसे एक बार फिर सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजना को लागू कराने से पहले बैकफुट पर आ गई। आलम यह है कि कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन अभी तक जारी है और दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब के हजारों की संख्या में किसान बॉर्डर और हाईवे पर बड़ी संख्या में प्रदर्शन के लिए जुटे हैं। 

कृषि कानूनों के विरोध का आलम यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद इन कानूनों को लागू होने से रोक दिया। खास बात यह थी कि मोदी सरकार ने भी कोर्ट के इस कदम का विरोध नहीं किया। किसानों से बातचीत में सरकार ने खुद इन कानूनों को डेढ़ साल के लिए लागू न करने की बात कही थी। 
भाजपा ने सीएए और कृषि कानूनों की तरह ही अपनी महत्वाकांक्षी जम्मू-कश्मीर योजना को भी बैकसीट में धकेल दिया है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में तोड़ने के बाद भाजपा श्रीनगर और लेह को दिल्ली से ही नियंत्रित करने की योजना बना चुकी थी। इसके लिए लंबे समय तक कश्मीर के नेताओं को भी नजरबंद रखा गया। साथ ही सरकार ने टेलिकॉम सेवाओं पर भी रोक जारी रखी। लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच प्रतिबंधों में ढील देना और फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे नजरबंदी में रखे गए नेताओं को छोड़ना शुरू किया गया, वैसे ही मोदी सरकार को एक बार फिर कश्मीर अपने नियंत्रण से बाहर जाता दिखने लगा। 

आखिरकार भाजपा को कश्मीर में भी राजनीतिक चेहरों से बातचीत शुरू करनी पड़ी। पहले जितेंद्र सिंह समेत नेताओं के दल ने कश्मीर का दौरा किया और फिर इस साल 24 जून को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीरी नेताओं से मुलाकात कर इस केंद्र शासित प्रदेश के हालात फिर से पटरी पर लाने पर बातचीत की। 
अपनी इन तीनों महत्वाकांक्षी योजनाओं पर पीछे हटने से पहले मोदी सरकार 2014 में भी एक योजना को लेकर आलोचना का शिकार हुई थी। यह था जमीन अधिग्रहण अध्यादेश, जिस पर लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक में जबरदस्त हंगामा हुआ। आखिरकार इस विधेयक को राज्यसभा में मंजूरी न मिलने के बाद संसद की जॉइंट पार्लियामेंट कमेटी के पास भेजा गया। लेकिन यूपीए के समय लाए गए कानून में संशोधन कराने का विरोध जारी रहा। आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त 2015 में अपने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि किसानों को जमीन अधिग्रहण कानून के संशोधनों पर बहकाया जा रहा है और इसलिए इस अध्यादेश को वापस लिया जा रहा है।

विस्तार

23 मई 2019। ये वो तारीख थी, जब आम चुनाव में जीत हासिल करने के बाद नरेंद्र मोदी का दूसरी बार प्रधानमंत्री बनना तय हो गया। भारतीय जनता पार्टी को 2019 के आम चुनाव में 37 फीसदी से ज्यादा वोट मिले और पार्टी ने 303 सीटों पर बड़ी जीत हासिल की। लोकसभा में भाजपा का कब्जा करीब 55 फीसदी सीटों पर हो गया। माना जा रहा था कि देश की जनता ने 2014 से 2019 के कार्यकाल के दौरान अधूरे रह गए वादों को पूरा करने के लिए ही मोदी सरकार को दूसरा मौका दिया था। हालांकि, इस साल जुलाई में जब पीएम मोदी ने खुद मंत्रालयों की समीक्षा के बाद कैबिनेट में फेरबदल को मंजूरी दी, तो यह तय हो गया कि पीएम की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं अभी अधूरी हैं, जिन्हें सरकार अगले तीन साल में पूरा करने के लिए जोर-शोर से तैयारी कर रही है। 

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