Evaluation: All Is Not Effectively In West Bengal Bjp, Will Sukant Majumdar Be Ready To Cease The Stampede Of Going To Tmc – विश्लेषण: पश्चिम बंगाल भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं, क्या टीएमसी में जाने की भगदड़ रोक पाएंगे सुकांत मजूमदार

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सार

पश्चिम बंगाल में हार के बाद से ही भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को एक साथ रखने के लिए संघर्ष कर रही है। दल-बदल और कलह के साथ बंगाल भाजपा नेताओं में तृणमूल कांग्रेस में जाने की होड़ मची है तो पार्टी अपने प्रदेश अध्यक्ष को बदल कर अपने परंपरागत समर्थकों को संदेश देने की कोशिश कर रही है। क्या है बंगाल भाजपा का संघर्ष और क्या है ममता बनर्जी की रणनीति।

भाजपा महासचिव विजयवर्गीय और दिलीप घोष (फाइल फोटो)
– फोटो : PTI

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पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी में सब ठीक नहीं चल रहा है। कई नेता पार्टी छोड़कर तृममूल कांग्रेस के खेमे में जा रहे हैं। ममता वहां नेताओं को तोड़ रही है। बंगाल भाजपा का लोकप्रिय चेहरा माने जाने वाले सांसद बाबुल सुप्रियो भी पार्टी छोड़ चुके हैं। भाजपा नेताओं के दल बदलने के बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को पार्टी ने उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बदल दिया है। वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद की अपनी जिम्मेदारी में लौट आए हैं। बताए जा रहा है कि पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। 

राज्य में अपनी चुनावी हार के बाद से, भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को एक साथ रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है। पिछले कुछ महीनों में, पार्टी के चार विधायक, जो टीएमसी के पूर्व नेता थे, वे अपनी पुरानी पार्टी में वापस चले गए है। मुकुल रॉय उनमें से एक प्रमुख चेहरे हैं। लेकिन रॉय की ‘घर वापसी’ के बाद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और आसनसोल से दो बार के सांसद बाबुल सुप्रियो का टीएमसी में जाना शायद भाजपा के लिए एक बड़ा झटका था। तृणमूल कांग्रेस भाजपा में जाने की मची भगदड़ के बीच बागदा से भाजपा विधायक विश्वजीत दास विधायक तन्मय घोष तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे भाजपा ने दोनों विधायकों को विधानसभा से इस्तीफा देने को कहा। 

कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका पर थे सवाल
पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के बाद से ही कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ कुछ पार्टी नेताओं में कड़ी नाराजगी थी। सूत्रों के मुताबिक पार्टी के भीतर कई लोगों ने कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया था, जिसके बाद पार्टी आलाकमान तक भी पूरी रिपोर्ट पहुंचाई गई थी। बंगाल भाजपा में मचे घमासान के दौरान जून में कोलकाता की सड़कों पर विजयवर्गीय के खिलाफ पोस्टर लगाए गए थे। बताया जा रहा है कि मुकुल रॉय की तृणमूल कांग्रेस में वापसी के बाद  भाजपा के कई नेताओं ने विजयवर्गीय की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे।

 
दिलीप घोष की कार्यशैली अलग
प्रदेश अध्यक्ष रहे दिलीप घोष की पार्टी ने भूमिका बदल दी है। अपनी भूमिका बदले जाने के बाद दिलीप घोष  ने स्वीकार किया कि विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ गलतियां हुई हैं। नए अध्यक्ष बनाए गए हैं और नई रणनीति बनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रत्येक चुनाव के लिए अलग-अलग रणनीति होती है।

ऐसा नहीं है कि दिलीप घोष की अध्यक्षता में बंगाल की ताकत नहीं बढ़ी है। भाजपा बंगाल में 18 सांसदों और 77 विधायकों के साथ विरोधी पार्टी है, लेकिन इसका श्रेय उन्हें नहीं बल्कि संघ कार्यकर्ताओं को दिया जाता है। घोष सत्ता हासिल करने के मोदी-शाह के सपनों को पूरा नहीं कर पाए। हालांकि बताया यह जा रहा है कि भाजपा छोड़ कर जाने वाले नेताओं पर तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव तो है ही, घोष के खिलाफ शिकायतों ने भी कुछ नेताओं को भाजपा छोड़ने के लिए मजबूर किया, जिसे पार्टी आलाकमान ने गंभीरता से लिया है।

हवा में इमारत बनाने की कोशिश
पश्चिम बंगाल की राजनीति की नब्ज पकड़ने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं दिलीप घोष की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने ममता बनर्जी की लोकप्रियता को कम आंका और उसी हिसाब से पार्टी आलाकमान को अपनी रिपोर्ट दी। राज्य ईकाई ने सोचा जिस तरह सिर्फ मोदी की छवि दिखाकर जिस तरह 2019 के चुनाव में 18 सीटें ले आई उसी तरह विधानसभा में सत्ता पर काबिज हो जाएगी। लेकिन विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरा दिखाकर चुनाव जीतने की भाजपा की रणनीति काम नहीं आई। वहां राज्य स्तर पर सिर्फ एक नेता शुभेंदु अधिकारी थे। यह भाजपा की गलत रणनीति रही कि उन्होंने चुनाव में प्रधानमंत्री को उतार दिया। प्रदेश ईकाई ने हवा में इमारत बनाने की कोशिश की जबकि जमीन पर उनका संगठन मजबूत ही नही था। 

यूपी-बिहार की तरह बंगाल में ध्रुवीकरण नहीं
घोषाल के मुताबिक दिलीप घोष ने अन्य हिंदी भाषी क्षेत्रों की तरह बंगाल में ध्रुवीकरण की कोशिश की। सीतलकूची में चौथे चरण की वोटिंग के दौरान सीआईएसफ की फायरिंग में कुछ युवकों की मौत होने के बाद दिलीप घोष ने विवादस्पद बयान दिया था। पूरी भाजपा जयश्री राम और अन्य धार्मिक मुद्दों को लेकर ममता को घेरने की कोशिश कर रही थी। जबकि भाजपा भूल गई थी कि बंगाल में वोटों का ध्रुवीकरण यूपी-बिहार की तरह नहीं हो सकता। 

संगठन का विस्तार नहीं कर पाए घोष
वरिष्ठ पत्रकार गौतम लहरी भी मानते हैं कि अपने पूरे कार्यकाल में दिलीप घोष संगठन का विस्तार नहीं कर पाए। बूथ स्तर पर भाजपा के ज्यादा कार्यकर्ता नहीं है। बंगाल चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन बंगाल चुनाव इस तरह नहीं जीता जा सकता। दिलीप घोष को लेकर गुटबाजी भी बहुत बढ़ गई थी।
 
बाहर से नेताओं को लेने पर संघ समर्थक नाराज थे
तृणमूल कांग्रेस से विधायक, पार्षद समेत करीब 150 से ज्यादा नेता चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे। जो लोग तृणमूल से गए थे वे सत्ता के लिए गए थे, वे वापस आ गए। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राज्य ईकाई यह समझ ही नहीं पाई कि जो नेता तृणमूल कांग्रेस छोड़कर आए थे वे विचारधारा वाले नेता नहीं थे, बल्कि वे सत्ता के लोभ मे आए थे। जब भाजपा की सरकार नहीं बनी तो वे वापस लौटने लगे। दूसरी अहम बात कि चुनाव से पहले जो लोग बाहर से आए गए थे, इससे भाजपा के पारंपरिक समर्थक बहुत नाराज हुए थे। बाहर से आए ज्यादातर लोगों को पार्टी ने टिकट भी दे दिया जिसने संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं की नाराजगी बढ़ा दी थी। 

कई भाजपा पदाधिकारियों की तरह, घोष भी संघ के ही व्यक्ति थे। हालांकि, सूत्रों ने बताया कि समय के साथ उनके संबंध संघ के साथ बिगड़ते गए थे। संघ ने पिछले कुछ सालों में में बंगाल में भाजपा के लिए जमीन मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। घोष के नेतृत्व में, पार्टी ने चुनाव से ठीक पहले टीएमसी कार्यकर्ताओं को अंधाधुंध तरीके से शामिल करने के संघ के विरोध को नजरअंदाज कर दिया। लहरी कहते हैं सब कुछ ठीक होता और भूला दिया जाता अगर यह कदम भाजपा को सत्ता तक पहुंचा देती। असम में जिस तरह से कांग्रेस के लोगों को लेकर पार्टी ने अपना दायरा बढ़ाया वही फॉर्मूला वह बंगाल में अपनाने की कोशिश कर री थी, जो फेल साबित हुआ। 

क्या राज्य नेतृत्व में फेरबदल से पार्टी के भीतर की समस्याएं दूर होंगी?
ऐसे समय में जब पार्टी राज्य स्तर पर एक बहुत ही गंभीर संगठनात्मक संकट का सामना कर रही है, संगठन को मजबूती देने की कवायद शुरू हो गई है। दिलीप घोष की जगह पार्टी ने उनके मुकाबले  कम लोकप्रिय पहली बार के सांसद सुकांत मजूमदार को बंगाल में भाजपा का प्रमुख नियुक्त किया है। विधानसभा चुनाव के एक महीने बाद ही भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई में दरार खुलकर सामने आ गई है, जिसमें नेता कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अलग-अलग स्वर में बोलने लगे। 

पश्चिम बंगाल की राजनीति के जानकार मानते हैं कि यहीं से इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि राज्य ईकाई में समस्याएं पैदा हो रही है। जिसका परिणाम यह निकला कि कई नेता पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में जाने लगे। सूत्रों का कहना है कि पार्टी आलाकमान को उम्मीद है कि प्रदेश अध्यक्ष बदलने से राज्य भाजपा की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। हालांकि माना जा रहा है कि नई राज्य इकाई के प्रमुख सुकांत मजूमदार के लिए आगे बडी चुनौतियां खड़ी हैं। 

 
गौतम लहरी बताते हैं कि सुकांत मजूमदार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे सबसे पहले पार्टी में मची भगदड़ को रोकें। वे संघ संघ परिवार से आते हैं। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने से भाजपा ने अपने पुराने समर्थकों को मनाने और संघ को यह संदेश दिया है कि संगठन को मजबूत करने में उनके सुझावों को प्राथमिकता दी जाएगी। सुकांत 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल के बालूरघाट लोकसभा सीट से जीते हैं। उत्तर बंगाल से ही भाजपा को चुनाव में एससी-एसटी वोट मिले हैं। 

भाजपा की आगे की रणनीति क्या
सुकांत मजूमदार को लाने के बाद पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को अब 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर फोकस करने को कहा है। हालांकि पार्टी नेतृत्व का ध्यान फिलहाल अगले साल उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में होने वाले विधासनभा चुनाव पर है लेकिन पार्टी की कोशिश की है पिछली लोकसभा में लाए 18 सीटों को बचाकर रखा जाए। गौतम लहरी के मुताबिक अभी जो स्थिति है उसमें भाजपा के लिए 18 सीट भी बचाए रखना मुश्किल है। 

बाबुल सुप्रीयो को लंबा इतजार करना पड़ सकता है 
बाबुल सुप्रीयो ने इसी साल जुलाई में हुए मोदी कैबिनेट की फेरबदल के दौरान मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। वे इस तरह इस्तीफा लिए जाने से नाराज थे, लेकिन भाजपा सूत्रों का कहना है दरअसल भाजपा को सुप्रियो से कोई फायदा नहीं हुआ इसलिए उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। सूत्रों के मुताबिक यहां भी सुप्रियो को वह जगह मिलने के आसार कम है जिसकी उम्मीद में वे यहां आए हैं। मुकुल रॉय कभी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखते थे लेकिन भाजाप में घूम के आने के बाद पार्टी में दोबारा वह हैसियत नहीं बन पाई। बाबुल को भी अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। 
 
भाजपा नेताओं को तृणमूल में लेने से ममता को क्या फायदा 
विश्लेषक यह बताते हैं कि ममता के लिए फायदा यह है कि वह दिखा सकती हैं कि दो-दो बार के केंद्रीय मंत्री भी तृणमूल कांग्रेस में आ जाए। ममता को इससे ज्यादा फायदा नहीं है, लेकिन भाजपा को नुकसान जरूर पहुंच सकता है। ममता सिर्फ भाजपा को असहज करने के लिए पार्टी तोड़ रही हैं। हालांकि कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में आईं पार्टी की राज्यसभा उम्मीदवार सुष्मिता देव का कहना है ममता बनर्जी किसी पार्टी को तोड़ने में विश्वास नहीं रखती हैं, हम बस अपनी पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दर्जनों विधायक अभी तृणमूल कांग्रेस में आने को बेताब हैं लेकिन ममता बनर्जी ने अभी उन्हें इंतजार करने को कहा है।

ममता की प्लानिंग क्या है
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के मुताबिक हमारी कोशिश उत्तर बंगाल में भाजपा को तोड़ने की है। पिछले लोकसभा चुनाव में हमें 22 सीटें मिली थीं, इस बार 30-35 सीटों का लक्ष्य रखा गया है। ममता बस यही संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि मोदी-शाह को हराना नामुमकिन नहीं है, वे इसलिए विपक्ष की नेता के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करके देश भर में यही संदेश देने की कोशिश कर रही हैं। वे यह भी कहते हैं कि चुनाव के दौरान भाजपा ने जिस तरह से चुनाव प्रचार किया था, उससे भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी बढ़ गया था। मोदी-शाह, सारे केंद्रीय मंत्री, चुनाव प्रचार में उतर लेकिन चुनाव के बाद कोई नेता बंगाल नहीं आए। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत गिर गया है, हम उनके मनोबल को उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

 

विस्तार

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी में सब ठीक नहीं चल रहा है। कई नेता पार्टी छोड़कर तृममूल कांग्रेस के खेमे में जा रहे हैं। ममता वहां नेताओं को तोड़ रही है। बंगाल भाजपा का लोकप्रिय चेहरा माने जाने वाले सांसद बाबुल सुप्रियो भी पार्टी छोड़ चुके हैं। भाजपा नेताओं के दल बदलने के बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को पार्टी ने उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बदल दिया है। वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद की अपनी जिम्मेदारी में लौट आए हैं। बताए जा रहा है कि पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय भी इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। 

राज्य में अपनी चुनावी हार के बाद से, भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को एक साथ रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है। पिछले कुछ महीनों में, पार्टी के चार विधायक, जो टीएमसी के पूर्व नेता थे, वे अपनी पुरानी पार्टी में वापस चले गए है। मुकुल रॉय उनमें से एक प्रमुख चेहरे हैं। लेकिन रॉय की ‘घर वापसी’ के बाद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और आसनसोल से दो बार के सांसद बाबुल सुप्रियो का टीएमसी में जाना शायद भाजपा के लिए एक बड़ा झटका था। तृणमूल कांग्रेस भाजपा में जाने की मची भगदड़ के बीच बागदा से भाजपा विधायक विश्वजीत दास विधायक तन्मय घोष तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे भाजपा ने दोनों विधायकों को विधानसभा से इस्तीफा देने को कहा। 

कैलाश विजयवर्गीय की भूमिका पर थे सवाल

पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के बाद से ही कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ कुछ पार्टी नेताओं में कड़ी नाराजगी थी। सूत्रों के मुताबिक पार्टी के भीतर कई लोगों ने कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया था, जिसके बाद पार्टी आलाकमान तक भी पूरी रिपोर्ट पहुंचाई गई थी। बंगाल भाजपा में मचे घमासान के दौरान जून में कोलकाता की सड़कों पर विजयवर्गीय के खिलाफ पोस्टर लगाए गए थे। बताया जा रहा है कि मुकुल रॉय की तृणमूल कांग्रेस में वापसी के बाद  भाजपा के कई नेताओं ने विजयवर्गीय की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे।

 

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