Bjp Leaders Varun Gandhi And Maneka Gandhi Dropped From Nationwide Govt Has Sonia Rahul Decreased The Significance Of Them – चर्चा में: क्या सोनिया राहुल की वजह से घट गई भाजपा में मेनका वरूण की अहमियत, अब मां-बेटे का भविष्य क्या?

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सार

एक समय था कि भाजपा में मेनका गांधी और वरूण गांधी की खास पूछ थी। सोनिया-राहुल से मुकाबला करने के लिए ही उन्हें भाजपा में लाया गया था लेकिन वे सोनिया-राहुल विरोधी इमेज नहीं बना सके। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दोनों को जगह नहीं मिलने के बाद यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा में अब मां-बेटे की इस जोड़ी की प्रासंगिकता या जरूरत खत्म हो गई है? 

सोनिया-राहुल की वजह से घट गई मेनका वरूण की पूछ
– फोटो : Amar Ujala

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2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा है। इससे सोनिया-राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान लग रहे हैं तो इसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ रहा है और यह स्वाभाविक है। लेकिन क्या इसका असर भारतीय जनता पार्टी की नेता मेनका गांधी और वरूण गांधी के सियासी करियर पर भी पड़ रहा है?

यह सवाल जरूर हैरानी पैदा कर सकता है  कि सोनिया-राहुल की वजह से मेनका-वरूण को क्या नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन राजनीति के जानकार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मां-बेटे को जगह नहीं मिलने का यही मतलब निकाल रहे हैं कि जैसे-जैसे सोनिया-राहुल कमजोर पड़ रहे हैं भाजपा में मेनका-वरूण की अहमियत भी कम हो गई है।

पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का समर्थन कर रहे थे। लखीमपुर खीरी कांड को लेकर वे लगातार योगी सरकार पर निशाना साध रहे थे और जिस तरह का बागी तेवर अपनाए हुए थे तभी राजनीतिक पंडितों को अंदेशा हो गया था कि अब भाजपा में उनका भविष्य उज्जवल नहीं है। जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेनका गांधी और उनके बेटे वरूण गांधी को जगह नहीं मिली तो सवाल उठने शुरू हो गए। 

क्या है राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्व
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी 80 सदस्यों की समिति होती है जिसे नीति-निर्धारक समिति माना जाता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल होने वाले नेताओं की पार्टी में एक खास जगह होती है। इस बार पार्टी ने कई नए नेताओं को कार्यकारिणी में जगह दी है, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, विजय बहुगुणा और मिथुन चक्रवर्ती भी शामिल हैं। 

भाजपा के मीडिया संपर्क अधिकारी सुदेश वर्मा से जब यह पूछा गया तो उन्होंने अमर उजाला डिजिटल को बताया कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में किसी को रखने का फैसला पार्टी नेतृत्व करती है। नए लोग आते हैं और पुराने जाते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। पार्टी जो भूमिका देखती है वह देती है। वे अभी लोकसभा सदस्य हैं। पार्टी में सब लोगों का महत्व रहता है। 

 
सोनिया के मुकाबले के लिए मेनका आईं
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, उस समय यह माना गया कि उत्तर प्रदेश में सोनिया गांधी का मुकाबला अगर कोई कर सकता है तो वह मेनका गांधी ही है। सोनिया और मेनका के रिश्तों में पड़ी दरार और इंदिरा गांधी से मेनका की नाराजगी से हर कोई वाकिफ है और भाजपा ने पारिवारिक रिश्तों में पड़ी दरार और नाराजगी का सियासी फायदा उठाने की कोशिश की और मेनका को पार्टी में शामिल किया।

उन्हें उत्तर प्रदेश से लगातार लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया और मेनका जीतकर संसद भी पहुंचती रही। लेकिन कांग्रेस के गिरते ग्राफ के कारण आज भाजपा में मेनका गांधी और वरुण गांधी की वैसी जरूरत और राजनीतिक प्रासंगिकता नहीं रह गई है। दोनों की एंट्री भाजपा में इसलिए हुई थी कि गांधी परिवार को जवाब दिया जाए। 

पार्टी ने बहुत कुछ दिया
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामशेषण बताती हैं कि दोनों को प्रमोद महाजन पार्टी में लेकर आए थे। वे अक्सर हमें कहा कहा करते थे कि अब भाजपा में भी दो गांधी हैं, हमारे पास भी गांधी परिवार है और इस पर सिर्फ कांग्रेस का हक नहीं। वे बताती हैं कि मेनका गांधी जब भाजपा में शामिल हुई थीं तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में असर कम था। मेनका की पार्टी में पूछ हुई। उनके पीछे-पीछे वरूण भी शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें बहुत कुछ दिया। 

एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि मेनका गांधी को शामिल करके भाजपा ने एक बड़ा जोखिम लिया था क्योंकि वे संजय गांधी की पत्नी हैं। संजय गांधी पर आपतकाल लागू करने की मुख्य भूमिका मानी जाती है। लेकिन पार्ट खुश थी कि सोनिया का मुकाबला करने के लिए इंदिरा की दूसरी बहू को लाकर उनकी काट ढूंढ ली गई है। सूत्रों के मुताबिक मेनका को यह समझाया गया कि उनके बेटे का भविष्य भी भाजपा में ही है। अपने बेटे को सम्मानजक कद देने के शर्त पर ही मेनका भाजपा में शामिल हुई थीं।
 
वरुण गांधी की भाजपा में एंट्री 2004 में हुई थी तब की कांग्रेस पर सोनिया गांधी का पूरा राज था। यही वह वक्त था जब राहुल गांधी पहली बार 2004 में अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रह थे। सोनिया राज से ही यह माना जाने लगा था कि आगे कांग्रेस की बागडोर राहुल गांधी संभालेंगे। जिस वक्त वरूण भाजपा में आए थे तब की भाजपा पर वाजपेयी-आडवाणी की छाप थी। उन्हें लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और प्रमोद महाजन का पूरा समर्थन हासिल हुआ। गांधी परिवार से ही एक दूसरे मां-बेटे की जोड़ी को अपनी पार्टी में लाकर भाजपा गदगद थी।

राजनाथ के दौर में यूपी का प्रमुख चेहरा माने गए वरूण
राधिका रामशेषण के मुताबिक राजनाथ सिंह जब पार्टी अध्यक्ष तो दोनों मां-बेटे को पार्टी से बहुत कुछ मिला। जब तक भाजपा की कमान राजनाथ सिंह के पास रही, तब तक वरुण गांधी की पार्टी में सम्मानजनक हैसियत रही। राजनाथ सिंह जब अध्यक्ष थे तो 2013 में उन्हें महासचिव बनाया और वे सबसे युवा महासचिव बने। फिर उन्हें पश्चिम बंगाल का प्रभारी बना दिया गया। लेकिन जैसे-जैसे भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में आई, तो वरुण गांधी पार्टी महासचिव पद से विदा हो गए और पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी भी उनसे ले ली गई। जबकि राजनाथ सिंह के दौर में उन्हें यूपी में पार्टी की प्रमुख चेहरा माना जाने लगा था।

ऐसा रहा वरूण का करियर 
2004 में वरूण 25 साल के भी नहीं हुए थे इसलिए उस साल लोकसभा चुनाव नहीं लड़ पाए थे। 2005 में महाजन की मृत्य हो गई। सूत्रों ने बताया कि उन्हें 2006 में पार्टी ने मध्यप्रदेश की विदिशा का उपचुनाव लड़ाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। बताया जाता है कि वरूण तभी भाजपा नेतृत्व से नाराज हो गए।

2009 में वे पहली बार चुनाव में खड़े हुए और राजनीति में प्रवेश किया। उन्हें पीलीभीत से मां मेनका गांधी की सीट से टिकट दे दिया गया। वे पौने तीन लाख वोटों से जीते। उस समय जीत का यह मार्जिन गांधी परिवार के तीन अन्य सदस्यों सोनिया, राहुल और मेनका से भी ज्यादा थी। उसके बाद 2014 में वे सुल्तानपुर से और 2019 में पीलीभीत से चुनाव जीत कर संसद पहुंचे। 
 
राहुल का जवाब नहीं बन पाए वरूण
हालांकि वरूण गांधी को जिस तरह राहुल गांधी के जवाब के तौर पर लाया गया था वे जवाब वो नहीं बन पाए। ना ही मेनका और वरूण सोनिया और राहुल विरोधी इमेज बना सके। हां पार्टी को इतना जरूर फायदा हुआ कि वरूण ने राहुल गांधी की धर्मनिरपेक्ष छवि से विपरीत कम्यूनल छवि बनाने की कोशिश की और यह वोटों के ध्रुवीकरण में मददगार बना।   

कद कैसे घटता गया?
भाजपा और संघ को लंबे समय से कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार एक किस्सा बताते हैं। 2013 का समय था। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की चर्चा जोरों पर थी। लेकिन मई में आयोजित पार्टी की स्वाभिमान रैली में वरूण गांधी ने तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह की जमकर तारीफ की और उनकी तुलना वाजपेयी से कर दी। उनके इस बयान से इस बात को हवा मिली की कहीं 2014 में पीएम पद की रेस में राजनाथ सिंह भी तो शामिल नहीं हो गए।

दूसरी तरफ मोदी जब गोवा में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने गए तो वरूण गांधी आडवाणी खेमे के साथ खड़े हो गए और पीएम उम्मीदवार के तौर पर राजनाथ सिंह को अपनी पसंद बताई। सूत्रों के मुताबिक इस घोषणा के बाद 2014 के चुनाव से पहले जब मोदी दिल्ली आए तो वे यहां एक सप्ताह रूके लेकिन कोशिश करने के बाद भी वे एक बार भी वरूण गांधी को मिलने का समय नहीं दिया। 

राधिका रामशेषण बताती हैं मेनका और वरूण गांधी की कभी मोदी-शाह जोड़ी के साथ जमी नहीं और इसलिए धीरे-धीरे दोनों मां-बेटे किनारे लगा दिए गए। यही वजह रही कि 2019 की जीत के बाद मोदी मंत्रिमंडल में दोनों में से किसी को जगह नहीं दी गई।

 
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले 2016 में यूपी में राष्ट्रीय कार्यकरिणी की बैठक इलाहाबाद में हो रही थी। एयरपोर्ट से लेकर सभा स्थल तक बड़े-बड़े वरूण गांधी को मुख्यमंत्री बनाने के होर्डिंग लगा दिए गए। पूरे शहर में ऐसे होर्डिंग लगे थे। इससे पार्टी नेतृत्व सख्त नाराज हो गई और तुरंत पोस्टर और होर्ड़िंग्स हटाने के आदेश दिए गए। उसके बाद 2017 के चुनाव में उनकी कोई भूमिका नहीं रही। 

राधिका रामशेषण एक अन्य किस्सा सुनाती हैं। 2017 के चुनाव के समय एक बार मेनका ने कहीं यह बयान दे दिया कि मुख्यमंत्री के रूप में वरूण भी एक चेहरा हैं और इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। बाद में शाह उनके घर गए और उन्हें यह बयान वापस लेना पड़ा। रामशेषण मेनका और वरूण को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नहीं शामिल किए जाने का यही मतलब निकालती हैं कि अब उनकी पार्टी में पारी खत्म हो गई है। उनका कहना है कि जब गांधी परिवार का वह औरा ही नहीं  बचा तो अब क्या लड़ाई है।

अब उनके पास रास्ता क्या 
भाजपा में उपेक्षित होने के बाद क्या मेनका और वरूण कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं? राधिका रामशेषण इस बात से बिल्कुल इंकार करती हैं। उनका मानना है कि वे पार्टी जरूर छोड़ सकते हैं लेकिन कांग्रेस विकल्प है क्या नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सोनिय तो छोड़िए राहुल-प्रियंका से भी उनके संबंध उतने मधुर  नहीं लगते है। वरूण गांधी की शादी में इस परिवार से कोई नहीं गया था। अगर वरूण जाएंगे तो उत्तर प्रदेश में किसी गैर कांग्रेसी पार्टी में जा सकते हैं।  

वरूण ने क्यों अपनाए बागी तेवर
वरूण गांधी को अपनी सियासी जमीन बचाने की चिंता थी।  लखीमपुर खीरी, सुल्तानपुर और उधमसिंह नगर- सिखों का इलाका है। लखीमपुर खीरी में प्रदर्शन कर रहे ज्यादा किसान सिख थे। मेनका गांधी सिख परिवार से हैं और उनका इन मतादाताओं के बीच जनाधार माना जाता है। मेनका-वरूण क डर था कि किसान आंदोलन का उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

वरूण गांधी अपने संसदीय क्षेत्र में लोगों की निजी तौर भी बहुत मदद करते हैं। कई गरीब बच्चों की शिक्षा और गरीब लड़कियों की शादी करवाई है। भले ही वे गांधी परिवार से अलग हो गए हों वे लेकिन वे हमेशा नेहरू की तरह हाथ पीछे करके चलते हैं। वे कविताएं और लेख लिखते हैं। माना जा रहा है कि यदि पार्टी ने वरूण गांधी और मेनका गांधी से किनारा किया तो पार्टी को उत्तर प्रदेश के तराई के इस क्षेत्र में नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

 

विस्तार

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का ग्राफ तेजी से गिरा है। इससे सोनिया-राहुल के नेतृत्व पर सवालिया निशान लग रहे हैं तो इसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ रहा है और यह स्वाभाविक है। लेकिन क्या इसका असर भारतीय जनता पार्टी की नेता मेनका गांधी और वरूण गांधी के सियासी करियर पर भी पड़ रहा है?

यह सवाल जरूर हैरानी पैदा कर सकता है  कि सोनिया-राहुल की वजह से मेनका-वरूण को क्या नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन राजनीति के जानकार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मां-बेटे को जगह नहीं मिलने का यही मतलब निकाल रहे हैं कि जैसे-जैसे सोनिया-राहुल कमजोर पड़ रहे हैं भाजपा में मेनका-वरूण की अहमियत भी कम हो गई है।

पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का समर्थन कर रहे थे। लखीमपुर खीरी कांड को लेकर वे लगातार योगी सरकार पर निशाना साध रहे थे और जिस तरह का बागी तेवर अपनाए हुए थे तभी राजनीतिक पंडितों को अंदेशा हो गया था कि अब भाजपा में उनका भविष्य उज्जवल नहीं है। जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेनका गांधी और उनके बेटे वरूण गांधी को जगह नहीं मिली तो सवाल उठने शुरू हो गए। 

क्या है राष्ट्रीय कार्यकारिणी का महत्व

भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी 80 सदस्यों की समिति होती है जिसे नीति-निर्धारक समिति माना जाता है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल होने वाले नेताओं की पार्टी में एक खास जगह होती है। इस बार पार्टी ने कई नए नेताओं को कार्यकारिणी में जगह दी है, जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, विजय बहुगुणा और मिथुन चक्रवर्ती भी शामिल हैं। 

भाजपा के मीडिया संपर्क अधिकारी सुदेश वर्मा से जब यह पूछा गया तो उन्होंने अमर उजाला डिजिटल को बताया कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में किसी को रखने का फैसला पार्टी नेतृत्व करती है। नए लोग आते हैं और पुराने जाते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। पार्टी जो भूमिका देखती है वह देती है। वे अभी लोकसभा सदस्य हैं। पार्टी में सब लोगों का महत्व रहता है। 

 

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